पत्थर पूजने,मंदिर जाने और पूजा पाठ करने बस से नही होगा जीवन धन्य, भगवान तो आपके घर में है

पत्थर पूजते है, मंदिर जाते है, पूजा पाठ करवाते है, और वो सारी चीजे करते है जिससे हमें लगता है कि हमारा जीवन धन्य हो जाएगा. लेकिन वास्तविकता है कि भगवान आपके घर में है आप अपने मां-बाप सहित पूर्वजों का ख्याल रखें उनकी हर छोटी-बड़ी खुशियों मैं शामिल हूं यह सबसे बड़ी पूजा है। लेकिन इस कलयुग में पत्नी और बच्चों की जरूरतों को पूरा करने जी तोड़ मेहनत करते हैं भागदौड़ और अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए लोग दिन-रात काम करते हैं। क्या आप जानते है कि ईश्वर आपके पास हमेशा होता है, बस ज़रूरी है उन्हें पहचानना.

दरअसल हम कहना चाहते है कि ईश्वर ने हमें खुद के रूप में माता पिता दिए है, ताकि ईश्वर का आशीर्वाद सदैव हमारे साथ रहे. लेकिन इस कलयुग में औलाद की नज़र में माता पिता का दर्ज़ा खत्म होता जा रहा है. अक्सर जाने अंजामे में संताने अपने माता-पिता को दुखी कर रहे है, जबकि उन्हें नहीं पता कि ऐसा करना भगवान दुखी होता है. मां बाप के कुछ कठोर शब्द जो एक बेटे के जीवन को खुशियों से भरने के लिए होते हैं लेकिन उन्हें बच्चों को वही शब्द शुभ जाते हैं और वह उनसे दूरी बनाने लगते हैं। अब सवाल ये है कि ऐसा क्या करे, जिससे हमारे पेरेंट्स हमें अंतरात्मा से आशीर्वाद दे, हम पर गर्व करे और अगले जन्म में दोबारा हमें पाने की इच्छा जाहिर करे.

तो चलिए आपके इस दुविधा को हम दूर किए देते है. हम आपको कुल 10 टिप्स देते है जिसे अपनाकर आप अपने माता पिता के चेहरे पर प्रसन्नता देख सकते है.

1 – माता पिता को कभी पलट कर जवाब ना दे. इससे उनको बुरा लग सकता है. जितना हो सके उनकी बातें सुनने की कोशिश करे. वैसे भी बुजुर्गो की बाते आपको बहोत कम ही अच्छी लगती है.


2 – मां बाप से ऊँची आवाज़ में बात ना करे. उनकी बातों को आराम से सुने, प्यार से समझाएं हो सकता है कि उनकी बातें दकियानूसी व पुराने विचारधारा की है लेकिन उनकी नजर में सही हो उस पर बैठकर गहन चिंतन व विचार विमर्श करें। अपने दफ्तर या बाहर का गुस्सा घर के बाहर ही रखे.


3 – कोई नया या बड़ा कार्य करने से पहले माँ-बाप से चर्चा जरुर करें. आप का ऐसा करना उन्हें अच्छा लगेगा, उन्हें लगेगा कि आप उनकी बातों को महत्व देते है.


4 – हर महीने उनके स्वास्थ का चेकअप कराएं. उनकी छोटी सी छींक का भी ख्याल रखे. समय से उनकी दवाइयां उन्हें लाकर दे. आपके ऐसा करने पर माता पिता को ज्ञात होगा कि आपको उनकी चिंता है.


5 – उनकी पसंद ना पसंद का ख्याल रखना आपकी ज़िम्मेदारी है. कभी कभार उन्हें खाने के लिए हॉटेल ले जाए, या उनकी कोई फेवरेट मिठाई उन्हें लाकर दे. यकीनन आपको सुखद एहसास ज्ञात होगा.


6 – बुढ़ापे की उम्र में अक्सर पेरेंट्स को बातें करना प्रिय लगता है. ऐसे में आपको जब भी समय मिले, एक फोन कर ले और उनका हालचाल पूछ ले.


7 – वृद्ध अवस्था में गुस्सा बहोत आता है. इसलिए जितना हो सके पेरेंट्स की किचकिच को इग्नोर करे. पत्नी को समझाएं बचपन में हम उनकी जिम्मेदारी थे आज वह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनका ख्याल रखें।


8 – हम जानते है कि बीवी के लिए प्यार अलग है और पेरेंट्स के लिए अलग. पर अक्सर माता पिता को लगता है कि शादी के बाद उनका बच्चा उन्हें भूल गया है. ऐसे समय में आपको दोनों के प्रति अपना प्यार बराबरी पर रखना है. ध्यान दे ! बीवी के सामने अपने पेरेंट्स की बेहद इज्जत करें, ताकि आपकी बीवी भी आपके माँ-बाप का सम्मान करे.


9 – अपने पेरेंट्स को मंदिर ले जाना कभी ना भूले. इससे आप दोनों को ही अनोखी खुशी और शांती मिलेगी.


10 – जिस तरह आप अपनी बीवी और बच्चो को नए कपडे पहनाने का शौक रखते है, ठीक उसी तरह माता-पिता को भी शॉपिंग करा दिया करे.

अपनी खुशियों का गला घोट हमारी बातें करते है पूरी

अपनी खुशियों का गला घोटकर हमारी सारी ख्वाहिश पुरी करने वाले माता पिता ही थे,आज जैसे हम अपने बच्चो को प्यार करते है उनकी जरूरतो को पूरा करने की हर संभव प्रयास करते है कल जब हम छोटे थे तो वह भी अपने शौक को पूरा करने के वजाय हमारे शौक को पूरा करने के लिए जी तोड़ मेहनत करते थे।आज जब बूढ़े हो रहे है तो उन्हे हमारी सब से ज्यादा जरूरत है। माना की वह कभी गलत कर देते है इसका मतलब यह नही की वह हमारा बुरा चाहते है।उन्होने हमें इस समाज में जीने का अधिकार दिलाया. जैसे आप अपने बच्चो को माफ कर देते है ठीक वैसे ही आप आपने माँ-बाप की गलतिया को नजरअंदाज करे। जब वे हमारे लिए इतना कुछ कर सकते है तो क्या हम इन 10 चीजो का ख्याल नहीं रख सकते.

हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद की पूर्णिमा से पितृपक्ष शुरु होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलते हैं। माना जाता है कि इन दिनों हमारे पूर्वज पितृ लोक से धरती यात्रा पर आकर अपनी आगे की पीढ़ी को देखते हैं और उनकी प्रसन्नता पर प्रसन्न होते हैं। वहीं इस समय यदि कोई अपने पितरों को याद नहीं करता और न ही उनके लिए श्राद्ध आदि धार्मिक कर्म करता है, तो पितर नाराज भी हो जाते हैं।

वैसे भी हमारा ये मानना है – माता-पिता के जीते जी उन्हें सारे सुख देना ही वास्तविक श्राद्ध है

Back to top button