लोकतंत्र पर पुलिस का हमला,पुलिसिया तांडव के शिकार हुये कनिष्क तिवारी

कार्यपालिका विधायिका के कार्यप्रणाली पर सवाल पूछने वाला पत्रकार अब सुरक्षित नहीं है, यह बात सीधी जिले की इस घटना को देखकर कहा जा सकता है। 

आर.के.श्रीवास्तव की कलम से

सिंगरौली। सल्तनों के जमाने में शासन के खिलाफ आवाज उठाने पर शिर कलम कर दिया जाता था। ऐसे बहुत से ऐतिहासिक साक्ष्य हैं जो राजतंत्र की बर्बरता को दर्शाते हैं मगर प्रजातंत्र में ऐसा नहीं है। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता ने मिलकर प्रजातंत्र की संरचना की है लेकिन ताज्जुब तब लगता है जब कार्यपालिका ही प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला करती है। ऐसा ही एक ताजा तरीन दृष्टांत मप्र के सीधी जिले में इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। पत्रकार कनिष्क तिवारी को आन्दोलनकारियों का समाचार कवरेज करने की एवज में पुलिस बर्बरता बर्दाश्त करनी पड़ी। सुना तो यह भी जा रहा है कि विधायिका के मेंबर सीधी विधायक भी इस बर्बरता के पीछे अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुये है। कार्यपालिका विधायिका के कार्यप्रणाली पर सवाल पूछने वाला पत्रकार अब सुरक्षित नहीं है, यह बात सीधी जिले की इस घटना को देखकर कहा जा सकता है। 


चन्द वर्षों से देश में सत्ता की चाटुकारिता, दलाली, मक्खनबाजी करने का दौर चला है। चरणदास लोग पुरस्कृत हो रहे हैं और पत्रकारिता के धर्म तथा मापदण्डों का पालन करने वाले ऐन-केन-प्रकारेण दण्डित हो रहे हंै। उन्हें शारीरिक, मानसिक, आर्थिक किसी भी तरीके से सत्ता पक्ष द्वारा दबाया जा रहा है और प्रताड़ित किया जा रहा है। जो लिखकर दे दिया जा रहा है उसको छापो, उसको प्रसारित करो, सवाल मत पूछो। इस अघोषित पालिसी का पालन करवाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। कनिष्क तिवारी ने सवाल पूछे थे, नतीजा भुगतना पड़ा। अर्धनग्न होकर पुलिस लॉकअप में बेइज्जत होना पड़ा। किसी भी मामले में यदि कोई सफेदपोश या पुलिस प्रशासन का चाटुकार जब थाने में जाता है तो क्या उसके भी इसी तरह कपड़े उतारे जाते है?

पत्रकारिता अगर पीत रूप धारण कर रही है या गैर कानूनी ढंग से काम कर रही है तो उसके लिए न्यायपालिका है। कलम अगर निर्धारित मापदण्डों के दायरे से बाहर है तो उसके लिए न्यायपालिका है। किसी भी पुलिस वाले को यह अधिकार नहीं बनता है कि वह फील्ड में काम कर रहे पत्रकार को किसी नेता के इशारे पर अर्धनग्न करके लॉकअप में बंद करदे। कहते हैं कि जब जनता चुप हो जाये, और पत्रकार सवाल करना बंद कर दे तो प्रजातंत्र की उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। पत्रकार के साथ इस तरह का अभद्र व्यवहार करने वाले कथित दोषी पुलिसकर्मियों को लाईन हाजिर कर देना क्या समस्या का निदान है? यह प्रश्र आज प्रदेश सहित देश के सभी पत्रकारों के दिमाग में नाच रहा है। फणिश्वर नाथ रेणु तथा गणेश शंकर विद्यार्थी के शब्द आज भी हमारे आस-पास ध्वनित हो रहे हैं। अंग्रेजों के जमाने में सवाल पूछने पर, मुद्दा उठाने पर इनके साथ यही होता था। आज हम स्वतंत्र भारत का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। अगर लोकतंत्र लाने में पत्रकारो की अहम भूमिका है तो उसके पोषण के दायित्व को भी हम नकार नहीं सकते। यह लड़ाई जारी रहेगी।

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