February 11, 2026

विंध्य न्यूज़

कहे सच बेहिचक

आओ खाएं सिंगरौली : उड़ती धूल, जाम का जाल और लोगों की बेबसी का नाम है एनसीएल!

oplus_131072

ऊर्जाधानी में धूल का ओलंपिक खेल होता तो सिंगरौली जितता सोना, काटा मोड़,शुक्ला मोड़, सर्किट हाउस चौराहा, गोरवी अंडरपास, में छाया रहता है धूल का गुब्बार

सिंगरौली। ऊर्जाधानी कहे जाने वाले इस शहर में इन दिनों सबसे ज्यादा उड़ती धूल, जाम और बेबसी परोसी जा रही है। दावे बड़े विकास, स्वच्छता और सुविधा के। लेकिन हकीकत यह कि एनसीएल के बाउंड्री के बाहर कदम रखते ही दृश्य पूरी तरह बदल जाता है। जहां कंपनी परिसर में साफ-सुथरी सड़कें और हरियाली नजर आती हैं, वहीं बाहर कोयले की धूल से ढकी गलियां, लगातार उठती उड़ान और वाहनों का जाम जनता की रोजमर्रा की पीड़ा बन चुका है। ऑटो, बस और हाइवा गुजरते ही हवा में ऐसा गुबार उठता है कि कुछ पल के लिए सड़क भी नजर नहीं आती। स्थानीय कहते हैं यहां सांस लेना भी साहस है।

बता दें कि 1985 में एनसीएल ने कदम रखा तो लोगों ने सोचा कि अब किस्मत चमकेगी, सड़के चमकेंगी, हवा साफ होगी। हुआ उल्टा कॉलोनी चमकी, शहर काला हुआ। एनसीएल की बाउंड्री के अंदर हरियाली, ताजगी, पार्क, क्लीन रोड… और बाहर ऐसा दृश्य जिसे देखकर पर्यावरण भी रो दे। काटा मोड़ से शुक्ला मोड़, शुक्ला से सर्किट हाउस, शुक्ला मोड़ से गोरवी अंडरपास … हर जगह एक ही नज़ारा धूल की नदी, कोयले की बारिश और जाम का महासागर। यहां के लोग रोज सांस लेते नहीं, फेफड़ों में कोयला जमा कर ईएमआई भरते हैं।

एनसीएल दावा करती है,हमारी परियोजनाएं स्वच्छता के प्रति संवेदनशील हैं। हां, बिल्कुल… बाउंड्री वॉल तक सीमित है ! जैसे ही आप एनसीएल हेड क्वार्टर परियोजना में और आवासीय कॉलोनी के आउटर बाउंड्री वॉल को पार करके जनता क्षेत्र में आते हैं, सिस्टम ऐसा गायब कि लगता है यहां स्वच्छ भारत मिशन का डेटा भी घुसने से पहले दम तोड़ देता है। एनसीएल में सफाई सिर्फ मेन गेट तक शुरू होतीं हैं। उसके आगे धूल का लोकतंत्र नजर आता है।

एनसीएल की बाउंड्री के अंदर गार्डनिंग, क्लीन रोड, स्प्रिंकलर, जैक्वार गार्डन जैसी हरियाली, और अंदर रहने वालों के चेहरे पर वही सुकून के साथ मानो यह कहते हो कि हमारा विकास सफल है। वहीं दूसरी ओर बाउंड्री बाल के बाहर निकलिए तो मानो ऐसा लगता है जैसे कोयले का ग्रह आ गया हो। एनसीएल मुख्यालय से महज 50 मीटर दूर थाना चौराहा, सर्किट हाउस चौराहा, शुक्ला मोड़, कांटा, रेलवे अंडरपास, गोरवी रेलवे स्टेशन से लेकर गोरबी ब्लॉक बी परियोजना तक हर जगह वही दृश्य,धूल का तूफ़ान, जाम का जाल और लोगों की बेबसी का हाल।

धूल के ओलंपिक खेल में सिंगरौली जितता सोना

सड़क के किनारे जमी धूल में पैदल और दो पहिया वाहन चालकों को ऑटो-बस-हाइवा की रफ्तार और हर गुजरते वाहन के साथ उठती धूल से आंखें तक खोलना मुश्किल रहता हैं। हैरानी तब होती है जब अधिकारी कहते हैं कि हम प्रदूषण नियंत्रण में पूरी कोशिश कर रहे हैं। बिल्कुल सही, कोशिश तो दिखती है बस हवा में नजर नहीं आती। शहरवासी कहते हैं अगर धूल ओलंपिक खेल होता तो सिंगरौली सोना जीतकर लौटता।

विकास के नाम पर धूल भरी मजबूरी

एनसीएल प्रभावित क्षेत्र में विकास हो रहा है ये बात सही है पर सवाल यह है कि ये विकास है या विकास के नाम पर धूलभरी मजबूरी। आखिर कब तक सिंगरौली को यह कोयला की थाली परोसी जाएगी? कब तक जनता को यही ‘मशहूर स्पेशल प्लेट’ मिलेगी, धूल की रोटी, धुएं की सब्जी, और प्रदूषण का अचार? सवाल जनता का है, और जवाब…वो अभी सरकारी फाइलों की धूल में अटका है।

About The Author