सिंगरौली। नगर निकायों में एल्डरमैन नियुक्तियों ने भाजपा के भीतर नई सियासी हलचल पैदा कर दी है। जहां एक ओर कुछ नामों पर सहमति और स्वागत देखने को मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर कई नियुक्तियों को लेकर पार्टी के भीतर ही असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। खासकर सोशल मीडिया पर सक्रिय कार्यकर्ता और समर्थक खुले तौर पर सवाल उठा रहे हैं कि वर्षों से संगठन के लिए जमीन पर काम करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं को आखिर किन कारणों से दरकिनार किया गया।
नगर पालिका निगम सिंगरौली के साथ-साथ बरगवां और सरई नगर परिषदों में हुई नियुक्तियों को लेकर बहस तेज हो गई है। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि संगठन की रीढ़ माने जाने वाले पुराने चेहरों की अनदेखी कर कुछ नजदीकी और प्रभावशाली लोगों को प्राथमिकता दी गई है। हालांकि निगम में दो वरिष्ठ नेताओं को एल्डरमैन बनाए जाने के फैसले का एक वर्ग समर्थन भी कर रहा है, लेकिन इससे असंतोष पूरी तरह शांत नहीं हुआ है।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो नगर निगम सिंगरौली का चुनाव करीब 10 महीने बाद प्रस्तावित है। ऐसे में इन नियुक्तियों को केवल प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि संगठनात्मक संतुलन साधने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी नेतृत्व की कोशिश है कि विभिन्न वर्गों और गुटों को साधते हुए चुनाव से पहले माहौल अपने पक्ष में किया जाए, लेकिन मौजूदा विरोध इस रणनीति को चुनौती देता नजर आ रहा है।
एक बड़ा सवाल एल्डरमैन के प्रभाव को लेकर भी उठ रहा है। परिषद की बैठकों का अनियमित अंतराल और सीमित कार्यकाल को देखते हुए यह चर्चा है कि नए नियुक्त एल्डरमैन कितनी सक्रिय भूमिका निभा पाएंगे और शहर के विकास से जुड़े मुद्दों पर उनका कितना असर होगा। फिलहाल, सिंगरौली नगर निगम पर सबसे ज्यादा राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं। पार्टी के भीतर उठ रहे असंतोष को कैसे संभाला जाता है और इसका आगामी चुनावों पर क्या असर पड़ता है, यह आने वाले समय में साफ होगा।