February 11, 2026

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हाईकोर्ट का बड़ा सवाल, बोरवेल बंद फिर कैसे पहुँचा ज़हरीला पानी घरों तक? ननि अधिकारियों की बढ़ेगी मुश्किलें

इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों के मामले में मंगलवार को हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी ने शासन और नगर निगम की कार्यप्रणाली की पोल खोल दी। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि शासन द्वारा पेश की गई डेथ ऑडिट रिपोर्ट न सिर्फ अस्पष्ट है, बल्कि गुमराह करने वाली भी प्रतीत होती है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब 18 बोरवेल बंद कर दिए गए थे, तो आखिर ज़हरीला पानी घर-घर तक पहुँचा कैसे? यह सवाल अब पूरे प्रशासनिक तंत्र पर भारी पड़ रहा है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अजय बागड़िया ने अदालत को बताया कि रिपोर्ट में मौतों के कारण स्पष्ट नहीं किए गए और वॉटर बर्न डिज़ीज़ जैसे संदिग्ध शब्दों का प्रयोग कर मामले को भ्रमित करने की कोशिश की गई। कई मौतों पर जानकारी नहीं लिख देना शासन की गंभीर लापरवाही और संवेदनहीनता को उजागर करता है। अदालत ने इसे बेहद चिंताजनक माना। नगर निगम की दलील भी कटघरे में आ गई।

निगम का कहना था कि प्रभावित क्षेत्र के सभी बोरवेल बंद कर दिए गए हैं, लेकिन कोर्ट ने सीधा सवाल किया—फिर दूषित पानी पाइपलाइन में आया कैसे? इस प्रश्न पर निगम कोई ठोस जवाब नहीं दे सका। इसके साथ ही सिर्फ 8 मानकों पर पानी की जांच किए जाने पर भी अदालत भड़क उठी, जबकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पहले ही 34 मानकों पर जांच कर चुका था। अदालत ने पूछा कि जब खतरा इतना गंभीर था, तो जांच अधूरी क्यों रखी गई?

पाइपलाइन बदलने के टेंडर, उसकी समय-सीमा और काम की प्रगति पर भी न्यायालय ने तीखे सवाल किए। सबसे चौंकाने वाला तथ्य मुआवज़े को लेकर सामने आया। सरकार ने दो लाख रुपये मुआवज़े की घोषणा तो की, लेकिन वह भी रेड क्रॉस चैरिटी फंड से देने की बात सामने आई। कोर्ट ने पूछा कि जब सामान्य हादसों में चार लाख का प्रावधान है, तो यहां पीड़ितों के साथ भेदभाव क्यों?

पूरी सुनवाई के बाद कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रख लिया, लेकिन तल्ख टिप्पणियों ने साफ कर दिया कि इस हादसे में सिर्फ सिस्टम फेल नहीं हुआ, बल्कि सच छुपाने की कोशिश भी हुई है। अब सबकी नजरें फैसले पर टिकी हैं, जो जिम्मेदार अफसरों के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।

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