सिंगरौली। प्रभारी मंत्री सम्पतिया उइके के दौरे से ठीक पहले जिले में जो तबादला खेल चल रहा है, उसने सत्ता, सिस्टम और सियासत तीनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। एक तरफ सरकार पारदर्शिता और सुशासन का दावा कर रही है, तो दूसरी तरफ एक सब इंस्पेक्टर का तबादला रोकने के लिए दिल्ली से भोपाल तक सिफारिशों की लाइन लगना इस दावे पर सीधा सवाल बनकर खड़ा है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों की सक्रियता और बैकडोर दबाव की चर्चाएं तेज हैं, जबकि विपक्ष इस पूरे मामले को तबादला उद्योग बताकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। हालात ऐसे बन गए हैं कि अगर यह तबादला रुकता है, तो किरकिरी सिर्फ प्रशासन की नहीं, बल्कि सत्ता के शीर्ष तक जाएगी।
सूत्रों के मुताबिक 3 जुलाई को पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाना द्वारा चार एसआई के तबादले सिंगरौली से सतना के लिए किए गए थे, जिन्हें 4 जुलाई को एसपी द्वारा रिलीव भी कर दिया गया। लेकिन इसके बाद शुरू हुआ असली खेल। बताया जा रहा है कि एक एसआई, जो हाल ही में जयंत कमाऊ चौकी में मोटी रकम देकर पदस्थ हुआ था, उसका तबादला होते ही पूरा समीकरण बिगड़ गया। चर्चा है कि करीब 10 लाख रुपये के रिचार्ज के बाद मिली यह पोस्टिंग महीने भर भी नहीं चल पाई और अब रकम की भरपाई से पहले ही सिम बंद हो गई। यही वजह है कि अब संबंधित एसआई तबादला रुकवाने के लिए बड़े स्तर पर प्रयास कर रहा है।
सूत्र बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर तक सिफारिशें लगाई जा रही हैं और भोपाल में प्रभावशाली लोगों के दरबार में लगातार हाजिरी दी जा रही है। फिलहाल फाइल सहायक पुलिस महानिरीक्षक (कार्मिक) के यहां अटकी बताई जा रही है और माननीय की मंजूरी मिलने पर तबादला रुकने की पूरी संभावना जताई जा रही है। अब प्रभारी मंत्री संपत्तियां उइके के दौरे से पहले कयास लगाए जा रहे हैं कि खाली पदों पर जल्द आदेश जारी हो सकते हैं। शहर में यह भी चर्चा है कि यदि यह विवादित तबादला रुकता है, तो विपक्ष को सरकार और प्रशासन पर हमला करने का बड़ा मुद्दा मिल जाएगा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीतिक दबाव के आगे प्रशासन झुकेगा, या फिर नियमों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा? आने वाले 24 घंटे इस पूरे तबादला उद्योग की दिशा तय कर सकते हैं।
बिना प्रभारी के 22 दिन से संवेदनशील यूपी बॉर्डर चौकी
बिना प्रभारी के 22 दिन से चल रही उत्तर प्रदेश सीमा से सटी संवेदनशील जयंत चौकी ने पुलिस व्यवस्था की गंभीर पोल खोल दी है। जिस चौकी को सुरक्षा का पहला मोर्चा माना जाता है, वहां जिम्मेदार अधिकारी का न होना सीधे-सीधे कानून-व्यवस्था को जोखिम में डाल रहा है। हैरानी की बात यह है कि सिस्टम इस गंभीर चूक को सुधारने के बजाय तबादला रोकने और सिफारिशों के खेल में उलझा हुआ है। सवाल उठता है कि क्या प्रशासन के लिए संवेदनशील सीमा की सुरक्षा से ज्यादा पोस्टिंग का खेल अहम हो गया है?