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Singrauli News : सतना तबादला, यहां से रिलीव फिर भी आमद नहीं! अरुण सिंह की भूमिका पर जयंत में सवाल

जयंत में कथित वसूली का नेटवर्क चर्चा में, एएसआई रवि गोस्वामी का नाम आने से पुलिस महकमे पर सवाल

सिंगरौली। जयंत चौकी को लेकर विवाद थमने के बजाय अब और गहराता जा रहा है। 3 जुलाई को चौकी प्रभारी अरुण सिंह का सतना तबादला हुआ और एसपी षियाज़ के.एम. ने उन्हें 4 जुलाई को जयंत से रिलीव भी कर दिया, लेकिन सूत्रों के मुताबिक अब तक उन्होंने सतना में आमद नहीं दी है। दूसरी ओर एएसआई राजेश दुबे को जयंत चौकी का प्रभारी बनाया जा चुका है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि तबादला आदेश और रिलीविंग के बाद भी अरुण सिंह की भूमिका आखिर क्या है? प्रभारी मंत्री के दो दौरों के बावजूद जिस तबादला प्रकरण पर स्थिति साफ नहीं हुई, उसने पुलिस महकमे में कथित तबादला उद्योग और राजनीतिक प्रभाव की चर्चाओं को फिर हवा दे दी है।

सतना में आमद नहीं, जयंत में अरुण सिंह की चर्चा

3 जुलाई को सतना के लिए तबादला और जयंत से रिलीव किए जाने के बावजूद यदि अरुण सिंह ने अब तक वहां आमद नहीं दी है, तो पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। सूत्रों के मुताबिक अरुण सिंह की जयंत क्षेत्र में सक्रियता की चर्चाएं लगातार बनी हुई हैं। ऐसे में यदि पुलिस विभाग को भी संदेह है कि तबादले के बाद उनकी जयंत में आवाजाही या संपर्क बना हुआ है, तो संबंधित अवधि का कानूनी प्रक्रिया के तहत सीडीआर और अन्य उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड जांच का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं। इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि तबादले के बाद उनकी गतिविधियां कहां और किन लोगों से संपर्क में थीं। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन अब विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

चौकी के सामने से कबाड़ यूपी पहुंचने की चर्चाएं तेज

जयंत चौकी के आसपास कथित अवैध कबाड़ कारोबार को लेकर चर्चाएं एक बार फिर तेज हैं। सूत्रों के मुताबिक क्षेत्र से चोरी के कबाड़ की खरीद-फरोख्त कर उसे उत्तर प्रदेश की ओर भेजे जाने की बातें सामने आ रही हैं। सवाल इसलिए गंभीर है कि जिन रास्तों से कथित कारोबार संचालित होने की चर्चा है, उनमें जयंत चौकी के सामने से गुजरने वाले मार्ग भी शामिल बताए जा रहे हैं। यदि यह सच है तो पुलिस निगरानी और चेकिंग व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। वहीं कथित वसूली में एएसआई रवि गोस्वामी का नाम जोड़े जाने की चर्चाओं ने मामला और गरमा दिया है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। अब पुलिस विभाग से अपेक्षा है कि निष्पक्ष जांच कर स्थिति स्पष्ट करे।

राजनीति और तबादला उद्योग पर सवाल

जयंत चौकी का मामला अब पुलिस महकमे की फाइल से निकलकर सियासत के गलियारों तक पहुंचता दिख रहा है। तबादला आदेश हुआ, अधिकारी रिलीव भी हुए, लेकिन आमद का सवाल अब भी हवा में है—मानो सरकारी आदेश भी अब रास्ता पूछकर मंजिल तक पहुंचते हों। प्रभारी मंत्री के दो दौरे हो गए, समीक्षा बैठकें हो गईं, निर्देश भी दिए गए, लेकिन जयंत की कुर्सी पर उठ रहे सवाल जस के तस हैं। व्यंग्य यही है कि सरकारी नौकरी में आदेश कागज पर चलता है और प्रभाव शायद उसके आगे। यदि तबादला लागू है तो आमद क्यों नहीं, और यदि रुक गया है तो आदेश कहां है? अब जनता जानना चाहती है, यह तबादला व्यवस्था है या प्रभावशाली लोगों के लिए अलग व्यवस्था?

आलेख – प्रदीप कुमार द्विवेदी

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