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तहसीलदार के आदेश पर भी नहीं हटा कब्जा, गौचर भूमि में फिर शुरू खेती, जनसुनवाई में हुई शिकायत

बेदखली के आदेश के बाद भी कब्जा बरकरार रहने का आरोप, पटवारी की कार्रवाई पर उठे सवाल; आवेदक ने मौके की कार्रवाई को महज खानापूर्ति बताया

सिंगरौली। जिले के सरई तहसील क्षेत्र अंतर्गत ग्राम दुधमनिया में गौचर के लिए आरक्षित सरकारी भूमि पर कथित अतिक्रमण का मामला अब जनसुनवाई तक पहुंच गया है। ग्रामीण रामलखन सिंह ने शिकायत कर आरोप लगाया है कि तहसीलदार द्वारा अतिक्रमण हटाने और संबंधित व्यक्ति को बेदखल करने का स्पष्ट आदेश जारी किए जाने के बावजूद जमीन से कब्जा नहीं हटाया गया और अब उसी भूमि पर दोबारा खेती शुरू कर दी गई है। मामले में हल्का पटवारी की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।

शिकायत के अनुसार ग्राम दुधमनिया स्थित खसरा क्रमांक 3415 की करीब 1.200 हेक्टेयर भूमि मध्यप्रदेश शासन की है और गौचर के लिए आरक्षित बताई गई है। आरोप है कि उक्त भूमि के हिस्से पर ग्राम निवासी लालबहादुर पनिका द्वारा लंबे समय से कब्जा कर खेती-किसानी की जा रही है। ग्रामीण का कहना है कि गौचर भूमि पर निजी कब्जे के कारण गांव के लोगों के आम निस्तार और पशुओं के चरने की सुविधा प्रभावित हो रही है।

तहसीलदार ने दिया था बेदखली का आदेश

मामले को लेकर रामलखन सिंह द्वारा तहसीलदार सरई के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की गई थी, जिस पर प्रकरण क्रमांक 0039/अ-68/2025-26 दर्ज हुआ। शिकायत के मुताबिक मौके की जांच और सुनवाई के बाद तहसीलदार सरई ने 8 दिसंबर 2025 को आदेश जारी कर 15 दिवस के भीतर संबंधित अतिक्रमणकारी को गौचर भूमि से कब्जा हटाकर बेदखल करने के निर्देश दिए थे।

आवेदक का आरोप है कि निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी आदेश का प्रभावी पालन नहीं हुआ। इसके बाद तहसीलदार द्वारा 13 जुलाई 2026 को हल्का पटवारी को पत्र जारी कर अतिक्रमण हटाने तथा दो दिवस के भीतर पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए।

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मौके की कार्रवाई पर पटवारी की भूमिका सवालों के घेरे में

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि तहसीलदार के निर्देश के बाद जब हल्का पटवारी मौके पर स्थल पंचनामा तैयार करने पहुंचे, तब वह स्वयं भी मौके पर मौजूद था। आरोप है कि पटवारी ने उसे मौके से हटा दिया और कार्रवाई को सीमित रखते हुए केवल औपचारिकता पूरी की गई।

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि संबंधित व्यक्ति को भूमि से कब्जा हटाने के संबंध में प्रभावी समझाइश नहीं दी गई और न ही वास्तविक रूप से उसे बेदखल किया गया। यही वजह बताई जा रही है कि आदेश के बावजूद कथित कब्जा बरकरार है और अब उक्त भूमि पर धान की रोपाई किए जाने का आरोप लगाया गया है।

आदेश कागजों में या जमीन पर?

पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब तहसीलदार द्वारा सरकारी गौचर भूमि से अतिक्रमण हटाने का आदेश पहले ही पारित किया जा चुका है, तो आखिर मौके पर उसका पालन क्यों नहीं हुआ? यदि पटवारी ने कार्रवाई पूरी कर पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत किया है तो फिर उसी भूमि पर दोबारा खेती कैसे शुरू हो गई?

शिकायतकर्ता ने जनसुनवाई में प्रशासन से मांग की है कि तहसीलदार के 8 दिसंबर 2025 के आदेश का मौके पर प्रभावी रूप से पालन कराया जाए, संबंधित व्यक्ति को गौचर भूमि से बेदखल किया जाए और कार्रवाई के दौरान शिकायतकर्ता की मौजूदगी सुनिश्चित कर पूरी कार्रवाई का पारदर्शी पंचनामा तैयार कराया जाए।

अब देखना यह है कि सरई तहसील प्रशासन सरकारी गौचर भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए जमीन पर कार्रवाई करता है या फिर आदेश और पालन प्रतिवेदन की कागजी प्रक्रिया तक ही मामला सीमित रहता है।

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