सिंगरौली। जिले की पुलिस व्यवस्था इन दिनों किसी मोबाइल कंपनी के अस्थिर नेटवर्क जैसी हो गई है, जहां रिचार्ज भी था, टॉकटाइम भी था, लेकिन अचानक वैलिडिटी खत्म हो गई और कॉल बीच में ही कट गई। फर्क बस इतना है कि यहां सिम कार्ड नहीं, बल्कि चौकी प्रभारी की कुर्सियां दांव पर हैं और रिचार्ज की रकम लाखों में बताई जा रही है।
मामला 3 जुलाई को जारी हुए चार सब इंस्पेक्टरों के तबादले से जुड़ा है, जिन्हें 4 जुलाई को ही सिंगरौली से रिलीव कर दिया गया। आदेश तो साफ था, लेकिन इसके बाद शुरू हुआ असली खेल। सूत्र बताते हैं कि एक एसआई अब अपने तबादले रुकवाने के लिए भोपाल से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक जुगाड़ भिड़ा रहे हैं। वजह वही पुरानी कमाऊ चौकी का अधूरा टॉकटाइम। चर्चाओं में सबसे ज्यादा गर्म मामला उस सब इंस्पेक्टर का है, जिसने कथित तौर पर भोपाल स्तर पर मोटा रिचार्ज कराकर मनचाही चौकी हासिल की थी। लेकिन पोस्टिंग के महज एक महीने के भीतर ही ट्रांसफर का आदेश आ गया। अब न तो निवेश की भरपाई हो पाई और न ही कुर्सी बची। ऐसे में हालात ऐसे बन गए हैं जैसे वैध रिचार्ज होने के बावजूद अचानक वैलिडिटी खत्म हो जाए।
बताया जा रहा है कि इस पूरे रिचार्ज सिस्टम में स्थानीय और प्रदेश स्तर के कुछ राजनीतिक किरदार भी सक्रिय रहते हैं, जिनके जरिए चौकी और थाना की सेटिंग होती है। अब जब टॉकटाइम बीच में ही खत्म हो गया, तो संबंधित एसआई उन्हीं राजनीतिक आकाओं पर दबाव बना रहा है, जिन्होंने यह रिचार्ज कराया था। सवाल सीधा है कि जब पैसे दिए गए थे, तो फिर ट्रांसफर क्यों हुआ? स्थिति और दिलचस्प तब हो गई जब करीब 17 दिन बीत जाने के बाद भी एक चर्चित कमाऊ चौकी बिना प्रभारी के खाली पड़ी है। यह वही चौकी है, जहां एक दिन भी कुर्सी खाली रहना असंभव माना जाता था। इससे यह साफ संकेत मिल रहा है कि सिस्टम फिलहाल हैंग हो चुका है।
पैसे लेकर आदेश बदलने का खेल!
इधर, विपक्ष पहले से ही तबादला उद्योग का आरोप लगाता रहा है कि पहले पोस्टिंग, फिर ट्रांसफर और फिर पैसे लेकर आदेश बदलने का खेल। सिंगरौली का यह मामला उन आरोपों को एक बार फिर हवा देता नजर आ रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस अधूरे रिचार्ज का एक्सटेंशन मिलेगा या फिर पैसा वापस होगा? फिलहाल तो पुलिस महकमे में नेटवर्क डाउन है और सभी की नजर इसी पर टिकी है कि सिस्टम रीचार्ज होगा या पूरी सिम ही बदल जाएगी।
आलेख – नवीन मिश्रा