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एक पेड़ की छांव में सिमटी इंसानियत, चारों ओर उजड़ता हुआ सिंगरौली

सिंगरौली। कभी घने जंगलों, हरियाली और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर सिंगरौली आज विकास की अंधी दौड़ में अपनी पहचान खोता जा रहा है। जिले में कोयले की प्रचुरता ने इसे देश के बड़े उद्योगपतियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना दिया है। परिणामस्वरूप, यहां लगातार भूमि अधिग्रहण हो रहा है, और इसके साथ ही गांव के गांव, बस्तियां और जंगल उजड़ते जा रहे हैं।

आज हालात यह हैं कि जहां कभी पेड़ों की कतारें और पक्षियों की चहचहाहट गूंजती थी, वहां अब धूल, धुआं और मशीनों की आवाज सुनाई देती है। पर्यावरण असंतुलन अपने चरम पर है, लेकिन जिम्मेदार तंत्र की संवेदनशीलता कहीं नजर नहीं आती। कागजों में हर साल वृक्षारोपण के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि देखरेख के अभाव में पौधे सूख जाते हैं और हरियाली सिर्फ फाइलों तक सिमट कर रह जाती है।

इस बीच एक तस्वीर बहुत कुछ बयां कर रही है—भीषण गर्मी में अधिकारी एकमात्र बचे पेड़ की छांव में खड़े हैं। यह दृश्य न केवल विडंबना है, बल्कि एक कड़वा सच भी उजागर करता है। जिन पेड़ों को बचाने और बढ़ाने की जिम्मेदारी इन्हीं कंधों पर है, आज वही पेड़ उनकी राहत का एकमात्र सहारा बन गए हैं।

सवाल यह है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ियों को क्या मिलेगा? उजड़े हुए जंगल, बंजर जमीन और प्रदूषित हवा? सिंगरौली का यह दर्द सिर्फ एक जिले का नहीं, बल्कि पूरे पर्यावरण तंत्र के लिए चेतावनी है।

अब समय आ गया है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। सिर्फ वृक्षारोपण नहीं, बल्कि उनके संरक्षण की सख्त व्यवस्था हो। वरना वह दिन दूर नहीं, जब एक पेड़ की छांव भी इतिहास बन जाएगी।

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सिंगरौली जिले को कौन चला रहा

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