शारदा इंटरप्राइजेज और नेशनल ट्रेडर्स का टेंडर किया निरस्त, ईओडब्ल्यू जांच से सच सामने आने की उम्मीद
सिंगरौली। शहर की सड़कों पर अंधेरा जरूर है, लेकिन नगर निगम के दफ्तरों में फैसलों की रोशनी कुछ चुनिंदा चेहरों पर खूब चमकती नजर आ रही है। 78 लाख रुपए का स्ट्रीट लाइट टेंडर अब व्यवस्था की पारदर्शिता पर नहीं, बल्कि ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने की मंशा पर सवाल खड़े कर रहा है। हैरानी इस बात की है कि इस पूरे मामले में महापौर द्वारा लिखे गए आपत्ति पत्र को भी दरकिनार कर दिया गया, मानों जनप्रतिनिधि की आवाज का कोई महत्व ही न रह गया हो।
बता दें कि नगर निगम क्षेत्र करीब 40 किलोमीटर में फैला है, जहां करीब 7 हजार से अधिक स्ट्रीट लाइटें लगी हुई हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा जोरों पर है कि इनमें से महज आधा सैकड़ा लाइटें ही खराब थीं, जिनका कारण भी ज्यादातर चोक खराब होना बताया जा रहा था। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन चोक को बदला जाता, तो अधिकांश लाइटें दोबारा चालू हो सकती थीं। लेकिन यहां समस्या का समाधान ढूंढने के बजाय मौका ढूंढा गया और सीधे 78 लाख का टेंडर निकाल दिया गया। इस पूरे प्रकरण में शारदा इंटरप्राइजेज और नेशनल ट्रेडर्स के टेंडर को निरस्त किया जाना भी कई सवाल खड़े करता है। आखिर किन कारणों से इन फर्मों को बाहर किया गया और क्या यह निर्णय पूरी तरह नियमों के तहत लिया गया या फिर मेसर्स एमआर इलेक्ट्रिकल भोपाल फर्म के लिए रास्ता साफ किया गया, यह अब जांच का विषय बन चुका है।
सूत्रों के अनुसार, इस टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी साफ दिखाई देती है। आरोप यह भी हैं कि प्रतिस्पर्धा को महज औपचारिकता बनाकर फाइल को आगे बढ़ाया गया। मामले को और गंभीर बनाता है महापौर का वह पत्र, जिसमें टेंडर निरस्त करने की मांग की गई थी। लेकिन इस पत्र पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना यह संकेत देता है कि या तो शिकायतों को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया या फिर किसी दबाव में पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। अब इस पूरे मामले में ईओडब्ल्यू (आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा) की संभावित जांच की मांग तेज हो गई है। यदि निष्पक्ष जांच होती है, तो यह केवल टेंडर की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे जुड़े कई अहम फैसलों और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी उजागर हो सकती है। फिलहाल शहर में यही चर्चा है कि यह टेंडर वास्तव में स्ट्रीट लाइट सुधारने के लिए था या फिर किसी खास ठेकेदार को चमकाने के लिए। सवाल बड़े हैं और जवाब अभी बाकी है।
सिटाडेल से टेंडर तक, कमिश्नर पर उठे गंभीर सवाल
नगर निगम की कार्यप्रणाली लगातार विवादों में रही है, जहां सिटाडेल कंपनी को लेकर लगे संरक्षण के आरोपों से लेकर 78 लाख के स्ट्रीट लाइट टेंडर तक फैसलों की पूरी श्रृंखला कमिश्नर की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। परिषद में पार्षदों का हंगामा और कलेक्टर गौरव बैनल की जांच में सामने आई अनियमितताओं के बावजूद ठोस कार्रवाई का अभाव यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं जिम्मेदारों को बचाने की कोशिश हो रही है। अब टेंडर प्रक्रिया में भी कथित गड़बड़ियों ने इस संदेह को और मजबूत कर दिया है कि प्रशासनिक निर्णय पारदर्शिता से ज्यादा किसी खास हित को ध्यान में रखकर लिए जा रहे हैं।
ठेकेदार मौज में, निगम कर्मचारी कर रहे सारा काम
नगर निगम में ठेका प्रणाली अब नियमों से नहीं, बल्कि रसूख से चलती नजर आ रही है। सूत्र की मानें तो मेसर्स एमआर इलेक्ट्रिकल भोपाल का ठेकेदार अपनी पहुंच का खुलकर हनक दिखा रहा है और बताया जा रहा है कि उसे भोपाल स्तर के एक प्रभावशाली नेता का संरक्षण प्राप्त है। यही वजह है कि वह अपने मनमाने तरीके से काम कर रहा है। टेंडर की शर्तों के विपरीत, जहां उसे अपने फिटर और हेल्पर लगाने थे, वहां नगर निगम के कर्मचारियों से ही पूरा काम कराया जा रहा है, जिससे साफ है कि फायदा एकतरफा और सिस्टम पूरी तरह बेबस या फिर मिला हुआ नजर आ रहा है।