सर्वे टीम के लौटने के बाद कमिश्नर का दौरा, क्या अब दिखावे की सफाई पर पर्दा डालने की कोशिश
सिंगरौली। शहर में स्वच्छता का हाल अब ऐसा हो गया है कि गंदगी पहले रहती है, सफाई बाद में और साफ शहर का सर्टिफिकेट सबसे पहले तैयार हो जाता है। खास बात यह कि स्वच्छता सर्वेक्षण टीम दो दिन पहले ही अपना काम खत्म कर वापस लौट चुकी है, लेकिन उसके जाते ही नगर निगम की सक्रियता अचानक बढ़ गई है। वार्ड 40 और 41 में पहले सफाई फिर सर्वे की चर्चाओं के बीच अब कमिश्नर सविता प्रधान के ताबड़तोड़ दौरे शुरू हो गए हैं- मानो सर्वे के दौरान जो दिखाना था वह दिखा दिया गया, और अब जो छिपाना है उस पर काम चल रहा हो। सवाल सीधा है क्या यह सफाई शहर के लिए थी या सिर्फ सर्वे टीम की नजरों के लिए।
सूत्रों के अनुसार सर्वे के दौरान जैसे ही दिल्ली से किसी स्थान का पॉइंट मिलता था, नगर निगम का अमला तुरंत एक्टिव हो जाता था। संबंधित वार्ड में सफाई अभियान शुरू कर दिया जाता, ताकि टीम के पहुंचने तक वहां की तस्वीर पूरी तरह सुधरी हुई नजर आए। इससे साफ है कि वास्तविक स्थिति को दिखाने के बजाय उसे पहले ही संवारने की कोशिश की गई। अब जब सर्वे टीम लौट चुकी है, तो कई जगहों पर फिर वही गंदगी और अव्यवस्था सामने आने लगी है, जिसने पूरे सिस्टम की नीयत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कमिश्नर सविता प्रधान पहले से ही सीवर लाइन, अमृत जल योजना और स्ट्रीट लाइट टेंडर जैसे मामलों में एकतरफा ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के आरोपों से घिरी रही हैं। इन योजनाओं में पारदर्शिता को लेकर पहले भी सवाल उठ चुके हैं, लेकिन हर बार कागजी दावे ही आगे आते रहे। अब स्वच्छता सर्वेक्षण में भी उसी तरह की मैनेजमेंट शैली की चर्चा तेज हो गई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सर्वे टीम के दौरान जो चमक दिखाई गई, वह अस्थायी थी। टीम के जाते ही हालात फिर पुराने ढर्रे पर लौट आए हैं। ऐसे में कमिश्नर का दौरा अब सवालों के घेरे में है। क्या यह दौरा वास्तव में सुधार के लिए है, या फिर उन खामियों को छिपाने का प्रयास, जो सर्वे के दौरान उजागर होने से बचा ली गईं? शहर में सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है, क्या स्वच्छता अभियान जमीन पर उतरेगा या सिर्फ सर्वे के कैमरों तक ही सीमित रहेगा? अगर यही स्थिति रही, तो सिंगरौली की सफाई व्यवस्था कागजों में जरूर चमकेगी, लेकिन हकीकत की गंदगी बार-बार सामने आती रहेगी।
पहले सफाई फिर सर्वे, सिस्टम की मिलीभगत उजागर
स्वच्छता सर्वेक्षण की साख पर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि जैसे ही सर्वे टीम को किसी स्थान का पॉइंट मिलता, उससे पहले ही नगर निगम का अमला वहां सफाई में जुट जाता था। यानी जिस वास्तविक स्थिति को दिखाया जाना चाहिए था, उसे पहले ही “सुधार” दिया जाता रहा। इस पूरे खेल में जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। अब जब सर्वे टीम लौट चुकी है, तो कई इलाकों में फिर वही गंदगी नजर आ रही है, जिसने इस पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
जवाबदेही से दूरी, स्वास्थ्य अधिकारी का गैर-जिम्मेदाराना रवैया उजागर
स्वच्छता सर्वेक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी जिम्मेदारी से बचने का जो रवैया सामने आया है, उसने प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। स्वास्थ्य अधिकारी बाल गोविंद चतुर्वेदी ने साफ जवाब देने के बजाय यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि “वरिष्ठ अधिकारियों से जानकारी ले लें। हैरानी की बात यह है कि जिन पर जमीनी व्यवस्था की जिम्मेदारी है, वही सर्वे के आंकड़ों और प्रक्रियाओं से अनभिज्ञता जता रहे हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि या तो जानकारी छिपाई जा रही है या फिर पूरी व्यवस्था ही लापरवाही के भरोसे चल रही है, जो बेहद गंभीर स्थिति है।