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Singrauli News: कमिश्नर ने पत्र लिखकर महापौर को दिखाया आइना, लिखा अब कार्यवाही में उड़ते प्रस्ताव नहीं चलेंगे!

एमआईसी की बैठकों में प्रस्ताव आए बिना ना आए, मगर कार्यवाही में फूल-फल गए

सिंगरौली। नगर निगम सिंगरौली में आम आदमी पार्टी की महापौर रानी अग्रवाल और कमिश्नर सबिता प्रधान के बीच टकराव अब खुलेआम प्रशासनिक दस्तावेज़ों में दर्ज होने लगा है। कमिश्नर ने महापौर को भेजे पत्र में जिस अंदाज़ में महापौर के व्यवस्थाओं को आइना दिखाया है, वह अपने आप में अनोखा है। पत्र पढ़कर साफ लगता है कि निगम में महापौर बैठकें कम, और कल्पनात्मक प्रस्तावों की उड़ान ज्यादा हो रही है।

गौरतलब है कि कमिश्नर सविता प्रधान ने महापौर रानी अग्रवाल को आइना दिखाने वाला पत्र लिखा हैं। उन्होंने ने पत्र में साफ लिखा कि एमआईसी संचालन नियम 1998 में बिना एजेंडा और बिना चर्चा किसी विषय को जोड़ने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सभी अधिकारी—डी.के. सिंह, संतोष पांडेय, रजनीत द्विवेदी, रूपाली द्विवेदी, ज्योति सिंह,अनुज द्विवेदी और एस.एन. द्विवेदी ने भी यही पुष्टि की कि बैठक शांत थी। पर कार्यवाही इतनी उपजाऊ कैसे हो गई? वहीं 14 नवंबर 2025 की एमआईसी बैठक में,अधिकारियों के मुताबिक, न कोई प्रस्ताव आया और न किसी विषय पर चर्चा हुई। लेकिन आश्चर्य यह कि कार्यवाही विवरण में अनेक प्रस्ताव हाज़िर हो गए। मानो महापौर ने बैठक की मेज़ पर नहीं, बल्कि फाइलों की दुनिया में कोई खास जादुई बटन दबा दिया हो। कमिश्नर का व्यंग्यपूर्ण सवाल यह कि यदि प्रस्ताव बैठक में नहीं आए, तो कार्यवाही में वे आए कहां से? पूरे विवाद का सार समझा देता है। 22 अक्टूबर की बैठक का मामला भी कम मज़ेदार नहीं। प्रस्ताव क्रमांक 08 पर न चर्चा हुई, न निर्णय, लेकिन कार्यवाही में उसे स्वीकृति प्राप्त दिखा दिया गया।

स्वीकृति’ बिना चर्चा, अधिकारियों की भी आँखें फटी

अधिकारियों ने स्पष्ट कहा जिन विषयों पर चर्चा नहीं हुई, लेकिन फाइल में स्वीकृति दिखाई गई। यह देखकर अधिकारियों की आंखें फटी रह गई। हालांकि कमिश्नर ने इसे कागज़ी स्वीकृति का चमत्कार बताते हुए कहा कि यह तरीका 1956 के अधिनियम का हिस्सा तो नहीं है। कमिश्नर सबिता प्रधान ने महापौर को चेताया कि भविष्य में कार्यवाही विवरण में वही विषय हों जो बैठक में विधिवत आए हों। उन्होंने लिखा कार्यवाही कल्पनाओं का नहीं, वास्तविक चर्चाओं का रिकॉर्ड होता है। सुझाव है कि प्रस्ताव बैठक में लाएं, फाइलों में नहीं।

अधिकार क्षेत्र के प्रकरण भी भेज देती है एमआईसी

महापौर पर आरोप है कि वे एमआईसी बैठकों में जिन बिंदुओं पर चर्चा ही नहीं होती, उन्हें भी कार्यवाही विवरण में शामिल कर देती हैं, जिससे निगम के अधिकारियों में भ्रम पैदा होता है और कामकाज प्रभावित होता है। एमआईसी सचिव द्वारा तैयार कार्यवाही को महापौर कथित तौर पर फेरबदल कर जारी करती हैं, जो नियम विरुद्ध है। जबकि महापौर को 1 करोड़ से 5 करोड़ तक की वित्तीय स्वीकृति का अधिकार है, परंतु वे इन प्रकरणों को भी एमआईसी में भेज देती हैं, जिससे न केवल शासन की मंशा के विपरीत काम होता है बल्कि अनावश्यक विलंब भी होता है। इससे स्पष्ट होता है कि महापौर शासन द्वारा दिए गए दायित्वों का प्रभावी निर्वहन करने में सक्षम नहीं हैं।

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