कचरा घोटाले और परिषद की हिदायत के बाद सक्रियता, सीटाडेल कंपनी पर आरोप और कलेक्टर जांच के बाद भी कार्रवाई नहीं
सिंगरौली: नगर निगम में बीते दिनों परिषद अध्यक्ष देवेश पांडे की सख्त हिदायत के बाद अचानक सक्रियता का जो नजारा सामने आया है, वह अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। वर्षों से चली आ रही अव्यवस्थाएं, कचरा प्रबंधन में गड़बड़ियां और पार्षदों सहित जनता की लगातार शिकायतें इन सब पर जहां पहले चुप्पी साध ली जाती थी, वहीं अब देर रात सड़कों पर उतरकर निरीक्षण किया जा रहा है। कमिश्नर सविता प्रधान की यह सक्रियता अब चर्चा का विषय बन गई है।
दिलचस्प यह है कि जिस कचरा प्रबंधन को लेकर तीन साल से लगातार आरोप लगते रहे, पार्षदों ने भ्रष्टाचार तक के आरोप लगाए, जांच ईओडब्ल्यू तक पहुंची। यहां तक कि कलेक्टर गौरव बैनल और कमिश्नर के सामने जांच में भी कई खामियां सामने आईं,उस पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। लेकिन जैसे ही परिषद अध्यक्ष ने बैठक में व्यवस्थाएं दुरुस्त करने की हिदायत दी, नगर निगम का पूरा अमला हरकत में आ गया। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह कार्रवाई वास्तव में व्यवस्था सुधारने के लिए है या फिर ऊपर से आई सख्ती के बाद छवि सुधारने की कवायद शुरू की गई है।
कमिश्नर मैडम की देर रात का निरीक्षण, सख्त निर्देश और अधिकारियों को चेतावनी, ये सब अब एक तयशुदा स्क्रिप्ट की तरह नजर आने लगे हैं। जनता भी यह समझने लगी है कि जब तक दबाव नहीं बनता, तब तक न तो निरीक्षण होता है और न ही कार्रवाई। और जब दबाव आता है, तो अचानक सख्ती का प्रदर्शन शुरू हो जाता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर समस्याएं पहले से मौजूद थीं, तो उन पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्यों तीन साल तक कचरा प्रबंधन की खामियां नजर नहीं आईं? और अब अचानक रात के अंधेरे में निरीक्षण कर क्या संदेश दिया जा रहा है? स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर वास्तव में बदलाव लाना है, तो दिखावे की कार्रवाई से आगे बढ़कर जिम्मेदारों पर ठोस कार्रवाई करनी होगी। वरना यह रात्रि सक्रियता सिर्फ एक अस्थायी प्रयास बनकर रह जाएगी, जो कुछ समय बाद फिर उसी पुरानी चुप्पी में बदल जाएगी।
ईओडब्ल्यू जांच ठंडी, मंत्री पकड़ या कमीशन का खेल
सीटाडेल के कचरा संग्रहण और निस्तारण में परिषद बैठक में पार्षद भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहे हैं। बीकानेर की जांच में बड़े खुलासों और सख्त कार्रवाई की उम्मीद थी, वही अब फाइलों में ठंडी पड़ती दिख रही है। शुरुआत में तेजी दिखाने वाली ईओडब्ल्यू की कार्रवाई अचानक धीमी क्यों हो गई? उदाहरण के तौर पर, छोटे मामलों में फौरन कार्रवाई करने वाला सिस्टम यहां चुप क्यों बैठा है? आम चर्चा यही है कि क्या किसी मंत्री की मजबूत पकड़ ने जांच की दिशा बदल दी या फिर कमीशन का खेल इतना गहरा है कि कार्रवाई आगे बढ़ ही नहीं पा रही। हालांकि कमिश्नर अब अपनी छवि सुधारने की कोशिश में लगी है।